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आदिवासी और माओवाद

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एक सच्चा समाज वहीं होता है जहाँ का हर व्यक्ति अपने समाज के लिए उत्तरदायित्व समझता हो। यह जिम्मेदारी केवल सुविधाएं प्राप्त करने की नहीं, बल्कि अपने समाज की आत्मा, संस्कृति और पहचान को बचाए रखने की भी होती है। आदिवासी समाज ने सदियों तक बिना किसी बाहरी सहायता के अपने अस्तित्व को जीवित रखा। जंगल, नदी, पहाड़ और मिट्टी से गहरे संबंध ने उसे आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाए रखा है। लेकिन जब वही समाज अपनी पहचान और हक की बात करता है, तो उस पर माओवादी होने का ठप्पा लगाया जाता है।

यह लेख इसी गहराई को छूता है — कि माओवाद केवल एक परदा है, जिसके पीछे असली निशाना आदिवासी की ज़मीन, संस्कृति और जीवन शैली है। आइए इसे विस्तार से समझें:

1. समाज और उत्तरदायित्व

हर समाज का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि उसमें रहने वाले लोग अपनी ज़िम्मेदारी को कितना समझते हैं। समाज केवल व्यक्ति का समूह नहीं होता, बल्कि वह एक जीवंत इकाई है, जिसमें हर सदस्य की सोच, कर्म और सेवा का योगदान होता है। जब कोई व्यक्ति अपने समाज के लिए कुछ करने की भावना रखता है, तो वह अपने अस्तित्व को एक बड़े उद्देश्य से जोड़ देता है। यह भावना आदिवासी समाज में भी गहराई से देखी जा सकती है।

आदिवासी समाज ने सदियों तक अपनी संस्कृति, भाषा और परंपराओं को बिना किसी सहायता के जीवित रखा। उन्होंने जंगलों में, पहाड़ों में और नदी किनारों पर सामूहिक जीवन जीते हुए एकजुटता और समर्पण का परिचय दिया है। जब समाज का कोई जागरूक व्यक्ति, चाहे वह शिक्षक हो, सामाजिक कार्यकर्ता हो या कलाकार, अपने लोगों के लिए काम करता है, तो वह अपनी समझ और क्षमता के अनुसार समाज को दिशा देने की कोशिश करता है।

लेकिन यही प्रयास जब आदिवासी समाज से निकलता है, तो वह संदेह की निगाह से देखा जाता है। उसे या तो माओवादी कहा जाता है, या सरकारी तंत्र उसे अपने लिए खतरा मानने लगता है। यह स्थिति न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि यह समाज के आत्मनिर्भर होने के प्रयासों पर सीधा आघात करती है।

आज जरूरत इस बात की है कि समाज के भीतर से जो आवाज़ें उठ रही हैं, उन्हें दबाया न जाए। बल्कि उन्हें सुना जाए, समझा जाए, और उनका समर्थन किया जाए। क्योंकि वही आवाज़ें आने वाले समय में बदलाव की नींव रखती हैं।

2. निशाने पर सिर्फ आदिवासी क्यों?

भारत के कई राज्य, विशेषकर मध्य भारत, माओवादी हिंसा से प्रभावित रहे हैं। छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में सबसे ज़्यादा हमले आदिवासी क्षेत्रों में हुए हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि इन हमलों का शिकार अधिकतर बार आदिवासी ही क्यों बनते हैं?

इन क्षेत्रों में गैर-आदिवासी भी रहते हैं — व्यापारी, अधिकारी, ठेकेदार, प्रवासी और कई अन्य समुदायों के लोग। लेकिन माओवाद के नाम पर कार्रवाई का केंद्र अधिकतर बार आदिवासी ही होता है। क्या यह केवल संयोग है या इसके पीछे कोई गहरी साजिश है?

दरअसल, माओवाद एक ऐसा मुखौटा बन चुका है, जिसके पीछे असली खेल ज़मीन, संसाधन और अधिकारों का है। आदिवासी अपनी ज़मीन छोड़ना नहीं चाहते, अपने जंगलों से दूर नहीं होना चाहते, और अपनी संस्कृति को बचाए रखना चाहते हैं। यह बात उन लोगों को चुभती है जो इन क्षेत्रों में खनिज, लकड़ी, जल और जमीन का दोहन करना चाहते हैं।

इसलिए आदिवासी को पहले माओवादी घोषित किया जाता है, फिर उसे डराया जाता है, और अंततः उसे उसके ही गांव से बाहर कर दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में एक सुनियोजित रणनीति काम करती है — सरकार, पुलिस, मीडिया और कॉरपोरेट जगत की मिलीभगत से।

जब तक हम इस असमानता और पक्षपात को नहीं समझेंगे, तब तक माओवाद केवल एक झूठी लड़ाई बनकर रह जाएगी, जिसका असली शिकार सिर्फ आदिवासी होगा।

3. विकास बनाम विस्थापन

देश में विकास की परिभाषा अधिकतर शहरों से तय होती है, जबकि उसका असर गांवों और जंगलों पर पड़ता है। आदिवासी क्षेत्रों में जो विकास पहुँचाया जा रहा है, वह असल में आदिवासियों को उजाड़ने की प्रक्रिया बन चुका है।

सरकार ने बड़ी-बड़ी औद्योगिक नीतियाँ बनाईं, जिनमें यह तय किया गया कि खनिज संपदा वाले क्षेत्र — जैसे बस्तर, दंतेवाड़ा, कोरापुट — औद्योगिक क्षेत्र घोषित होंगे। इन क्षेत्रों में कंपनियों को ज़मीन दी गई, और आदिवासियों को वहां से हटाया गया।

जो ज़मीनें आदिवासियों की पुश्तैनी थीं, जिन्हें उन्होंने सदियों से जोता और सींचा था, उन्हें या तो जबरदस्ती अधिग्रहित कर लिया गया या उन्हें मुआवज़े का लालच देकर विस्थापित कर दिया गया। परिणाम यह हुआ कि एक ओर कंपनियाँ मुनाफा कमाने लगीं, और दूसरी ओर आदिवासी शहरों की झुग्गियों में मजदूरी करते पाए गए।

इस विस्थापन का दर्द केवल घर छोड़ने का नहीं होता — यह आत्मा के एक हिस्से को काट देने जैसा होता है। जंगल, पहाड़ और नदियाँ केवल संसाधन नहीं, आदिवासी की पहचान हैं। जब उससे यह सब छीना जाता है, तो वह केवल ज़मीन नहीं खोता — वह अपना ईश्वर, अपनी संस्कृति और अपना आत्मबल खोता है।

यह विकास नहीं, यह विनाश है — और यह विनाश आदिवासी समाज को लगातार कमजोर कर रहा है।

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