Ad Code

सुबु रावेन गोंड




मैं गोंडी हूँ।


कभी आसमान के सितारों-सी चमकती,
कभी धरती की धूल-सी विनम्र होती,
गोंडवाना की पहचान में ढली हुई
मैं गोंडी हूँ।

मैं गोंड, मैं गोंडी, मैं गोंडवाना की संतान,
समय बदले, ज़माना बदले, पर मेरी आत्मा नहीं बदलती।
अर्थ चाहे गोंडी में लिखो या अंग्रेज़ी में,
मैं तो वही हूँ—
गोंडवाना की पहचान, मैं गोंडी हूँ।

हमारी संस्कृति में रैला पाटा, सैला पाटा की थिरकन,
गीतों में बसे कुपार बाबा, और हीरासुका बाबा की परंपराएँ,
हमारे पुरखों की कहानियों का उजास—
उन सबकी जीवंत पहचान मैं ही हूँ।
मैं गोंडी हूँ।

सदियाँ गुजर गईं, युग बदलते गए,
पर मैं आज भी वहीं खड़ी हूँ,
रात-दिन बदलते समय के पन्नों पर
अपना निशान छोड़ती हुई।
हर युग की पहली पुकार—
मैं गोंडी हूँ।

फिर भी कभी-कभी लगता है,
इस भागदौड़ भरी दुनिया के शोर में,
दूसरी भाषाओं की भीड़ में,
मानो मैं ही कहीं खोती जा रही हूँ।
धीरे-धीरे लगता है जैसे
अपनी ही जड़ों का स्वर मंद पड़ रहा हो,
और मैं—
अपना अस्तित्व बचाने में लगी हूँ।

लेकिन जब मेरी कहानी पढ़ने-सुनने वाले
आप जैसे लोग सामने आते हैं,
तो मेरे मन में फिर साहस जगता है।
लगता है—
मैं आज भी ज़िंदा हूँ,
मैं आज भी धड़कती हूँ,
क्योंकि मैं गोंडी हूँ।

मेरे दर्द को वही समझ सकता है
जो कोयावासी हो,
जिसने मिट्टी को दिल से छुआ हो।
मैं गोंडी हूँ…
प्रकृति की फूलक।

— लेखक : सुबु रावेन गोंड बालाघाट (म.प्र.)



एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ

Close Menu